नई दिल्ली. ये साइलेंट मूवीज का दौर था, तमाम भारतीय फिल्में बनाने की टेक्नीक सीखने देश से बाहर जा रहे थे और ज्यादातर भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक करेक्टर्स पर फिल्में बना रहे थे. ऐसे में भगवान बुद्ध पर सबसे पहले मूवी बनाने का आइडिया आया हिमांशु रॉय के दिमाग में. उन्हें बड़ा तबका भारतीय फिल्मों की पहली स्टार देविका रानी के पति के रूप में भी जाना जाता है. हिमांशु ने जर्मनी के फिल्ममेकर फ्रेंज ओस्टन से टाईअप किया और बना डालीं एक के बाद एक तीन फिल्में, जिनमें सबसे पहली थी बुद्ध के जीवन पर बनी ‘प्रेम संन्यास’.

दरअसल आज जिस तरह बॉलीवुड की मूवीज ओवरसीज मार्केट को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, इस दिशा में ये पहली फिल्म मानी जाती है, जो ना केवल इंटरनेशनल प्रोडक्शन थी बल्कि ओवरसीज मार्केट को ध्यान में रखकर ही उस वक्त एक आम भारतीय फिल्म की तुलना में दस गुनी लागत मे बनाई गई थी. हिमांशु रॉय कोलकाता के रहने वाले थे, शांतिनिकेतन में पढ़े थे और लॉ की डिग्री लेने के बाद बैरिस्टर बनने लंदन चले गए. जहां उनकी मुलाकात निरंजन पाल से हुई, जो स्क्रिप्ट राइटर थे. यहां से वो फिल्में बनाने के फील्ड में आ गए.

28 साल के हिमांशु रॉय जर्मनी के म्यूनिख पहुंचे, वो वर्ल्ड रिलीजंस पर एक फिल्म सीरीज बनाना चाहते थे और टेक्नीशियंस और पार्टनर ढूंढने के लिए पहुंचे थे. जहां उनकी मुलाकात हुई फ्रेंज ओस्टर ने. फ्रेंज फोटोग्राफर, पत्रकार और सोल्जर की नौकरी करने के बाद फिल्ममेकिंग में आ चुके थे, दुनियां घूम चुके थे. म्यूनिख कार्नीवाल में जब उन्होंने एक शॉर्ट फिल्म ‘लाइफ इन इंडिया’दिखाई तो हिमांशु की नजरों में आ गए.
दोनों के बीच लम्बा डिसकशन चला, को-प्रोडक्शन में तीन फिल्मों की योजना बनी. भगवान बुद्ध के जीवन पर ‘प्रेम संन्यास’, ताजमहल के निर्माण पर ‘शिराज’ और महाभारत के युद्ध पर ‘ए थ्रो ऑफ डाइस’.

साइलेंट फिल्मों का दौर होने से ये फायदा था कि आपको डबिंग करवाने जैसी मुश्किल नहीं थी. तय हुआ कि जर्मनी की तरफ से इक्विपमेंट, क्रू, कैमरा और डायरेक्टर मिलेगा तो हिमांशु रॉय की तरफ से स्क्रिप्ट, लोकेशंस, एक्टर्स और पूंजी मिलेगी. पैसे से मदद जयपुर के महाराज ने की, सैट लाहौर में लगाया गया, सैट को डिजाइन करने की जिम्मेदारी देविका रानी के कंधों पर थी. 26 फरवरी को एक शिप के जरिए हिमांशु और फैंज क्रू और इक्विमेंट्स के साथ निकले, और 18 मार्च को वो मुंबई पहुंच गए. इस फिल्म की कहानी ली गई द एडविन आर्नोल्ड की किताब ‘द लाइट ऑफ एशिया’ से, जो एक कवि और पत्रकार थे, पूना के गर्वनमेंट कॉलेज ऑफ संस्कृत में सात साल तक प्रिंसिपल भी रहे। इसी दौरान उन्होंने महायान बौद्धों के प्रमुख ग्रंथ ललित विस्तार को पढ़ा और उसके ट्रांसलेशन से द लाइट ऑफ एशिया में बुद्ध के जीवन पर कई कहानियां लिखीं.

इन्हीं कहानियों को एक स्क्रिप्ट में ढाला गया और तैयार हो गई प्रेम संन्यास। राजकुमार सिद्धार्थ का रोल खुद हिमांशु रॉय ने किया था. दिलचस्प बात ये है कि बीसियों सालों तक किसी को ये पता नहीं चला कि कि एडविन ने अपनी किताब ललिल विस्तार के ट्रांसलेशन से लिखी थी. दिलचस्प बात ये भी है कि फिल्म में केवल एक्टर्स ही भारतीय थे, और को-डायरेक्टर के तौर पर हिमांशु रॉय थे, स्क्रिप्ट को छोड़कर बाकी सभी तकनीशियन जर्मनी से थे. फिल्म की प्रोडक्शन कॉस्ट उस वक्त आई 1,71,423 रुपए, जो उस वक्त बनने वाली आम फिल्मों से दस गुना थी. जर्मनी में ये फिल्म खूब चली.

1926 में इसे ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम ने भी देखा और शाही परिवार ने फिल्म की जमकर तारीफ की. अमेरिका में भी इसे फिल्म आर्ट्स गिल्ड ने 11 मई 1928 को रिलीज किया। 2001 में इसे एक यूरोपियन चैनल जो फ्रांस और जर्मन का संयुक्त कंपनी है, ने इस फिल्म को फिर से पुराने प्रिंट्स से नया जीवन दिया और रिलीज किया, उसकी वजह थी, जितनी ये फिल्म भारत की विरासत थी, उतनी ही जर्मनी की भी थी. फ्रेंज ओस्टन बाद में जर्मनी के बड़े फिल्मकार बन गए, उन्होंने एक फिल्म स्टूडियो को खड़ा किया था बावरिया फिल्म स्टूडियो, आज वो यूरोप के सबसे बड़े स्टूडियोज में शुमार होता है. लेकिन भारत हिमांशु की मौत के बाद और फिर देविका रानी की दूसरी शादी के बाद हिमांशु रॉय के काम को ना सिर्फ उनकी इंडस्ट्री ने बल्कि सरकार ने भी भुला दिया.