फिल्म- दास देव
स्टार– 3
कलाकार- राहुल भट्ट, रिचा चड्ढा और अदिति राव हैदरी
डायरेक्टर- सुधीर मिश्रा

मुंबई. दास देव फिल्म की खासियत ये है कि आपको बांध कर रखती है. हर पल कुछ घट रहा है, जिसका कुछ अंदाजा आपको पहले से लगता है और कुछ अंदाजा आपका गलत भी हो जाता है, खासकर क्लाइमेक्स. यानी कहानी के नजरिए से और कहानी पर पकड़ के नजरिए से डायरेक्शन को देखा जाए तो फिल्म तारीफ के काबिल है, लेकिन जब आप पूरी फिल्म को देखने के बाद उसे नंबर देने की कोशिश करते हैं तो लगता है कुछ मिसिंग है, जिसके चलते आप उसे बड़ी या बहुत बेहतरीन फिल्मों में शुमार नहीं कर सकते.

एक्टर, पटकथा

पहले कहानी जान लेते हैं, शरत चंद्र के देवदास और शेक्सपेयर के हेलमेट से जोड़े रखने के चलते एक अजीब से तर्क के साथ फिल्म का नाम ‘दास देव’ कर दिया गया है. फिल्म की कहानी घूमती है देव (राहुल भट्ट), पारो (रिचा चड्ढा) और चांदनी (अदिति राव हैदरी) के इर्दगिर्द. कैसे हैलीकॉप्टर बम विस्फोट में अपने पिता विशम्भर (अनुराग कश्यप) की हत्या के बाद देव को नशे की लत लग जाती है. उसके चाचा अवधेश (सौरव शुक्ला) उसे अपने इलाके से बाहर शहर में भेज देते हैं, लेकिन जब हर्टअटैक पड़ता है, तो चाहते हैं कि वो वापस आए और राजनीतिक विरासत संभाले, जो उसके पिता की मौत के बाद अवधेश को मिल गई थी. जबकि अवेधश का दोस्त बिजनेसमेन एसके (दिलीप ताहिल) और चांदनी उसे कर्ज के जाल में फंसाकर एक बड़ा नेता बनाना चाहते हैं ताकि उसका बाद में फायदा लिया जा सके. पारो उसके बचपन की दोस्त है और उसका पिता देव के पिता का पुराना साथी. जो किसानों का नेता है और बॉक्साइट की बहुतायत को देखते हुए उनकी जमीन को सस्ते में नहीं बिकने देखना चाहता, इसके चलते उसकी अवधेश और एसके से बिगड़ी हुई है.

देव को नेता बनाने की पूरी प्लानिंग की जाती है, लेकिन उसका चाचा देव की पारो से शादी की शर्त रखता है किसानों को जमीन बेचने के लिए मनाने की, लेकिन अवधेश का एक मुलाजिम प्रभुनाथ किसानों पर गोलियां चलवा देता है. चांदनी देव को बचाने के लिए पारो के पिता को फंसा देती है, अवधेश पारो की शादी का हवाला देकर उसके पिता नवल को जुर्म कुबूलने के कह देता है, बाद में वो जेल में मर जाता है. पारो देव से गुस्सा होकर एक दूसरे नेता से शादी कर लेती है. किसानों पर गोलियां चलाने वाला मुलाजिम देव से ये कहकर सनसनी फैला देता है कि देव के पिता को उसके चाचा ने मरवाया था, पारो की मां भी देव की मां और उसके चाचा में अवैध रिश्तों के आरोप लगा देती है. कहानी इतनी तेजी से चलती है कि आप परदे से आंख नहीं हटा पाते, खासकर क्लाइमेक्स का अंदाजा तो शायद कोई नहीं लगा पाता.

फिल्म के हीरो राहुल भट्ट के बारे में बस यही नेगेटिव है कि वो ज्यादा मशहूर नहीं है, तभी शायद फिल्म देखने कम लोग जाएं. यूं वो अनुराग कश्यप की ‘अगली’ जैसी कुछ फिल्मों में काम कर चुका है. ‘मुक्काबाज’ वाले विनीत सिंह के हिस्से में भी कुछ सींस आए हैं. कुल मिलाकर हीरो को छोड़कर वाकई सभी जाने पहचाने और सशक्त एक्टर किरदारों में हैं, चावे हो सौरव शुक्ला हों, विपिन शर्मा हों, दिलीप ताहिल हों, दीपराज राणा हों या फिर विनीत सिंह, रिचा चड्ढा और अदिति राव हैदरी अपनी अपनी जगह फिट हैं. खासतौर पर अदिति राव हैदरी को मास्टर माइंड के तौर पर देखना अलग लग सकता है.

फिल्म की कहानी

ऐसे में जब फिल्म की कहानी जोकि एक पॉलटिकल थ्रिलर है, ऑडियंस को बांधे भी रखती है, तब भी फिल्म में कुछ मिसिंग लगता है. उसकी वजह भी है, फिल्म में दो बातों की गंभीर कमी है. एक अच्छे डायलॉग्स की और दूसरे विजुअल रिलीफ की, या गानों की. फिल्म का एक डायलॉग पढ़िए, कहते हैं कि ‘’प्रभुनाथ को अगर मूतते वक्त भी कोई जमीन दिख जाती है, तो वो किसी ना किसी तरीके से उसे हथिया ही लेते हैं.‘’ उसी तरह नरेशन में फिल्म को जहां ‘सोशलिस्ट नेताओं के बाप के अनसोशलिस्ट बेटों की हरकतों की कहानी’ बताया गया, वो भी क्रिएटिव कमेंट था, असर करने वाला. लेकिन ऐसी गैंग ऑफ वासेपुर टाइप फिल्मों में ऐसे मारक और दिलचस्प देसी डायलॉग्स की काफी गुंजाइश थी, जो एक दो डायलॉग्स तक में सिमट कर रह गई। फिल्म में कहीं भी विजुअल रिलीफ नहीं था, यानी फिल्म एक पल के लिए भी रुकती नहीं, ना कोई लम्बा रोमांटिक सीन और ना ही कोई गाना.

यूं फिल्म में दो तीन अच्छे गाने हैं, लेकिन वो कहानी के बैकग्राउंड में इस तरह से डाले गए हैं कि फिल्म का हिस्सा नहीं लगते और रिलीफ भी नहीं देते. आलम ये होता है कि मूवी देखते वक्त आपको मजा भी आ रहा होता है और आप इंटरवल का इंतजार भी बेसब्री से कर रहे होते हैं. यानी फिल्म में एक बड़ा पार्ट विजुअल म्यूजिक का और दूसरा बड़ा पार्ट फन का मिसिंग था, जो ऐसी फिल्मों में सैटायर के तौर पर आ सकता था. बावजूद इसके सुधीर मिश्रा की तारीफ करनी होगी कि फिल्म को बांधे भी रखा और लोगों ने जिस क्लाइमेक्स का अंदाजा लगाया था, उनमें से अधिकतर को गलत साबित कर दिया. सो फिल्म अगर कोई और बेहतर विकल्प आपको पास इस वीकेंड के लिए ना हो, तो कम कीमत की टिकट पर ‘दास देव’ एक पैसा वसूल फिल्म है.

अक्षय कुमार के नमस्ते लंदन के बाद अर्जुन कपूर के जरिए नमस्ते इंग्लैंड करेगा बॉलीवुड

जन्मदिन विशेष: इस वजह से डेविड धवन बेटे वरुण को नहीं करना चाहते थे बॉलीवुड में लॉन्च